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Thursday, 30 October 2025

तराइन का युद्ध: पृष्ठभूमि:,घटनाक्रम,युद्ध का वर्णन,परिणाम

 
तराइन का युद्ध: पृष्ठभूमि:,घटनाक्रम,युद्ध का वर्णन,परिणाम
 इतिहास की किताबों में कुछ युद्ध ऐसे हैं जो न केवल राजवंशों की किस्मत बदलते हैं, बल्कि पूरे देश की दिशा और दशा को प्रभावित करते हैं। ऐसा ही एक युद्ध है तराइन का युद्ध। यह युद्ध दो बार लड़ा गया—पहला तराइन का युद्ध (1191 ई.) और दूसरा तराइन का युद्ध (1192 ई.)। इन युद्धों ने दिल्ली सल्तनत की नींव रखी और भारत में इस्लामी शासन की शुरुआत की। आज के इस ब्लॉग में हम पहले तराइन के युद्ध  
पृष्ठभूमि: 
11वीं शताब्दी के अंत तक भारत में राजपूत वंशों का बोलबाला था। उत्तर भारत में चाहमान (चौहान) वंश के शासक पृथ्वीराज चौहान दिल्ली और अजमेर पर राज कर रहे थे। पृथ्वीराज को "राय पिथौरा" के नाम से भी जाना जाता है। वे बहादुर, कवि और कुशल योद्धा थे। उनकी प्रसिद्धि "पृथ्वीराज रासो" जैसे ग्रंथों में वर्णित है।
दूसरी ओर, मध्य एशिया से एक नया आक्रमणकारी उभरा—मुहम्मद गोरी (या शिहाबुद्दीन मुहम्मद घोरी)। गोरी अफगानिस्तान के घोर प्रांत का शासक था। वह भारत पर आक्रमण करके धन और साम्राज्य विस्तार की महत्वाकांक्षा रखता था। 1175 ई. से ही गोरी ने भारत पर छापेमारी शुरू कर दी थी। उसने मुल्तान, सिंध और पंजाब के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया। अब उसकी नजर दिल्ली और गंगा के मैदानों पर थी।
तराइन (आधुनिक तरावड़ी, हरियाणा में) एक रणनीतिक स्थान था, जो दिल्ली से करीब 110 किमी उत्तर में है। यहां की समतल भूमि युद्ध के लिए आदर्श थी। गोरी की सेना में घुड़सवार तीरंदाज और तुर्की योद्धा थे, जबकि पृथ्वीराज की सेना में हाथी, पैदल सैनिक और राजपूत घुड़सवार शामिल थे।
पहला तराइन का युद्ध (1191 ई.): घटनाक्रम
युद्ध की शुरुआत

गोरी का आक्रमण: 1191 ई. में मुहम्मद गोरी ने बड़ी सेना लेकर पंजाब पार किया और तराइन की ओर बढ़ा। उसका उद्देश्य पृथ्वीराज को हराकर दिल्ली पर कब्जा करना था।

पृथ्वीराज की तैयारी: पृथ्वीराज ने राजपूत सरदारों का गठबंधन बनाया। जयचंद (कन्नौज का गहड़वाल शासक) ने सहायता नहीं की (बाद में यह बदला लेने की कहानी प्रचलित हुई), लेकिन अन्य राजपूत राजा जैसे जयपुर, मेवाड़ आदि ने साथ दिया। पृथ्वीराज की सेना संख्या में गोरी से अधिक थी—लगभग 1 लाख सैनिक और 3000 हाथी!

युद्ध का वर्णन

पहला चरण: गोरी की सेना ने आक्रमण किया। उनके तुर्की घुड़सवार तेज और चुस्त थे। उन्होंने तीरों की बौछार की।

राजपूत प्रतिक्रिया: पृथ्वीराज की हाथी सेना ने गोरी के घोड़ों को भगाया। राजपूतों ने वीरतापूर्वक मुकाबला किया।

निर्णायक मोड़: गोरी स्वयं घायल हो गया (कुछ स्रोतों के अनुसार पृथ्वीराज ने उसे भाले से मार गिराया, लेकिन वह बच गया)। गोरी की सेना में भगदड़ मच गई।

परिणाम: गोरी हार गया और भाग खड़ा हुआ। पृथ्वीराज विजयी हुए। गोरी को बंदी बनाने का मौका था, लेकिन राजपूत परंपरा के अनुसार उसे छोड़ दिया गया (यह एक बड़ी भूल साबित हुई)।

परिणाम 

गोरी की हार, हजारों सैनिक मारे गए।
पृथ्वीराज की जीत, लेकिन उन्होंने गोरी के किले (जैसे भटिंडा) नहीं छीने।
गोरी अफगानिस्तान लौटा और बदला लेने की तैयारी की

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